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October 17, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ 6 अगस्त 2021।
राजस्थानी भाषा के नाट्य विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि संस्कृति संरक्षण के लिये राजस्थानी भाषा का रंगमंच समृद्ध और विकसित होना आवश्यक है। यह बात आज राजस्थानी विभाग, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर व राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ” राजस्थानी नाटक और रंगमंच : दशा और दिशा  ” विषयक राष्ट्रीय वेबिनार में प्रभावी रूप से रेखांकित की गई ।
विभागाध्यक्ष डॉ मीनाक्षी बोराणा ने बताया कि इस वेबिनार मे विषय विशेषज्ञ के रूप में बोलते हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कार्यवाहक अध्यक्ष व राजस्थानी नाटकों के प्रख्यात लेखक निर्देशक व आलोचक डॉ. अर्जुनदेव चारण ने 2500 वर्ष पूर्व लिखे गये भरत के नाट्यशास्त्र से ले कर विभिन ऐतिहासिक कालखण्डों का उल्लेख करते हुए राजस्थानी भाषा और उसकी गौरवमयी परम्परा पर विस्तार से प्रकाश डाला । डॉ. चारण ने कहा कि राजस्थानी भाषा के आधुनिक नाट्य लेखन को प्रोत्साहित करने हेतु प्रदेश के नाट्य कलाकारों को आगे आकर साहित्यकारों से नाटक लिखवाने चाहिए । उन्होंने कहा कि प्रसन्नता का विषय है कि आज राजस्थानी नाटकों की वैश्विक पहचान बन रही है ।प्रो. चारण नै अपने वक्तव्य में लोक और रंगमंच पर  विस्तृत विचार रखे।
लोकनाट्य के विषय विशेषज्ञ के रूप में अपने विचार प्रकट करते हुए राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष व लेखक निर्देशक कवि रमेश बोराणा ने कहा कि सभी संस्कृतियों का उद्भव  लोक जीवन ही है, क्योंकि यही मानव की सामूहिक ऊर्जा का स्रोत रही है ।
बोराणा ने राजस्थान के पारम्परिक व लोक नाट्यों के शिल्प व विधान की चर्चा करते हुए उसके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया । उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज प्रदेश में मारवाड़ के ख्याल,रम्मत, भरतपुर की नौटंकी, मेवाड़ की  तुराकलंगी, गवरी, भवाई, व टोंक की चार बेंत, दौसा का हेला ख्याल , सवाई माधोपुर का कन्हैया लोक नाट्य विलुप्ति के कगार पर है, जिसे समय रहते बचाना जरूरी है ।
वेबिनार में सामाजिक  व यथार्थवादी रंगमंच पर बोलते हुए वरिष्ठ नाट्यधर्मी, लेखक निर्देशक व केंद्रीय साहित्य अकादमी में राजस्थानी भाषा के संयोजक मधु आचार्य ने कहा कि  राजस्थान का सामाजिक व यथर्थवादी रंगमंच बहुत ही समृद्ध रहा है क्योंकि उसकी जड़ें समाज में गहरे तक फैली हुई थी । इन नाटकों में समाज की समस्याओं व कुररीतियों को प्रभावी रूप से दर्शाया जाता था । उन्होंने आधुनिक रंगमंच के सामने खड़ी चुनौतियों व राजस्थानी भाषा की मान्यता विषय पर भी अपने अनुभव साझा किए ।
वेबिनार की संयोजक व राजस्थानी  विभागाध्यक्ष डॉ. मीनाक्षी बोराणा ने सभी विषय विशेषज्ञों व प्रतिभागियों स्वागत करते हुए संगोष्ठी का विषय प्रवर्तन किया और कहा कि राजस्थानी भाषा के रंगमंच का उद्भव व विकास सतत होता रहा है, लेकिन वर्तमान में उनकी रंगमंचीय दशा दिशा पर चर्चा करना शोधार्थियों व रंग प्रेमियों के लिए आवश्यक है । उन्होंने प्राचीन, मध्यकाल व वर्तमान  में राजस्थानी भाषा के रंगमंच व उसके लेखन में आये बदलाव पर अपनी बात रखते हुए चर्चा की शरुआत की ।
जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के कला संकाय के अधिष्ठाता के.एल. रैगर ने राजस्थानी विभाग द्वारा लगातार किये जा रहे नवाचारों की प्रशंसा करते हुए कहा कि जिन लोक नाटकों को हम बचपन मे देखा करते थे वे आज नही है । हमे पुरातन की रक्षा करनी और नए का स्वागत करना है ।
विशेषज्ञों का परिचय डॉ, धनञ्जय अमरावत ने करवाया और डॉ .गजेसिंह राजपुरोहित ने धन्यवाद ज्ञापित किया