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October 16, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 17 मई 2026। श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स के फेसबुक पेज पर एक लाख फॉलोवर पूरे हो जाने पर टाइम्स द्वारा जिम्मेदार पत्रकारिता करते हुए प्रत्येक सप्ताह विशेष कवरेज शुरू की जा रही है। जिसमें टाइम्स के विशेष संवाददाता अशोक पारीक सभी पाठकों के समक्ष खोज-परक खबरें प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी पहल में प्रस्तुत है इस सप्ताह की यह विशेष स्टोरी:-
बढ़ रहा बीमारियों का आंकड़ा और मौतों का ग्राफ।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र में सड़क, करंट, डूबने, कीटनाशक से हादसों की संख्या अनियंत्रित रूप से लगातार बढ़ रही है एवं साथ ही बढ़ रहा है, क्षेत्र में मौतों का आंकड़ा, क्षेत्र में हर साल मलेरिया, डेंगू, टाईफाईड, न्यूमोनिया जैसी बीमारियों से प्रभावित क्षेत्रवासियों की संख्या भी बेतहाशा बढ़ रही है। लेकिन क्षेत्रवासियों का स्वास्थ्य सत्ता की घोषणाओं और आश्वासनों तथा विपक्ष के आंदोलन व आक्रोश की भेंट चढ़ रहा है। विडम्बना ही है कि सत्ता एवं विपक्ष केवल ट्रोमा के नाम पर विरोध-सर्मथन का खेल अपनी अपनी ताकत से खेल रहें है और इससे भी बड़ी विडम्बना यह है कि ट्रोमा सेंटर नहीं बनने तक उपजिला अस्पताल की सुध तक ना पक्ष ले रहा और न ही विपक्ष इस पर आवाज उठा रहा है। आंकड़ों पर गौर करें तो इस वर्ष के शुरूआती चार महिनों में श्रीडूंगरगढ़ उपजिला अस्पताल में करीब 74 हजार रोगियों की ओपीडी रही है। इन चार महिनों में 485 छोटी-मोटी दुर्घटनाएं हुई है। हॉस्पिटल में ही संचालित हो रहे अस्थाई ट्रोमा सेंटर में कुल 7,348 लोग घायल होकर पहुंचें, जिनमें से 636 को भर्ती किया गया।
रोगियों के ना बैठने की जगह, ना खड़े रहने की, आधे से ज्यादा डॉक्टर गायब।
श्रीडूंगरगढ टाइम्स। क्षेत्र के सबसे बड़े चिकित्सा स्थल श्रीडूंगरगढ़ उपजिला चिकित्सालय में हालत इस कदर खराब है कि यहां रोगियों के लिए खड़े रहने के लिए भी जगह नहीं है, ना ही बैठ कर विश्राम करने की। इस पर भी यहां आधे से ज्यादा चिकित्सकों के पद रिक्त होने से कोढ़ में खाज का काम हो रहा है। हालात तो बदतर तब हो जाते हैं, जब एक ही चैम्बर में दो-दो, तीन-तीन, चार-चार चिकित्सक बैठते है एवं इन्हें दिखाने वाले रोगियों की लाईनों में ऐसी भीड़ हो जाती है कि किसी बीमार के साथ गया हुआ स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार हो जाए। कहने को तो यहां उपजिला में 22 एवं ट्रोमा सेंटर में 6 चिकित्सकों के पद स्वीकृत है। परंतु उपजिला में 10 एवं ट्रोमा सेंटर में 1 चिकित्सक ही पदस्थापित किए हुए है। इन चिकित्सकों में भी ट्रोमा में राउंड द क्लोक ड्यूटी, इमरजेंसी ड्यूटी, बैठकें, कैम्पों के कारण प्रतिदिन औसतन छह से सात चिकित्सक ही रोगियों को उपलब्ध रहते हैं। प्रतिदिन 1000 से अधिक की ओपीडी को इन चिकित्सकों में बराबर भी बांटा जाए तो प्रति चिकित्सक अपनी ड्यूटी के 6 घंटों में औसतन 170 से अधिक रोगियों की जांच कर रहा है। अब इस पर अनुमान लगाया जा सकता है कि रोगियों की जांच किस गंभीरता के साथ हो रही है। अस्पताल में वरिष्ठ विशेषज्ञ मेडिसिन, स्त्री रोग विशेषज्ञ, ईएनटी विशेषज्ञ, फिजिशियन, सर्जन, आयुष चिकित्सा अधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पद खाली चल रहे हैं। दंत चिकित्सक अपने राजनीतिक रसूख के चलते श्रीडूंगरगढ़ चिकित्सालय से वेतन उठाते हुए भी डेपुटेशन पर बीकानेर में आनंद की नौकरी कर रहे है। इन रिक्त पदों के कारण मरीजों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है और ईलाज के लिए भी अन्यत्र भटकना पड़ रहा है। अस्पताल में रिक्त पद भरें जाएं एवं चिकित्सकों के कक्षों को अलग अलग किया जाए तो निश्चित रूप से यह स्थिति में सुधार हो सकता है।
ट्रोमा सेंटर ने दिया क्षेत्रवासियों को ट्रोमा (सदमा)
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। वर्ष 2023 के बजट में श्रीडूंगरगढ़ में नए ट्रोमा सेंटर एवं 100 बैड के उपजिला चिकित्सालय के निर्माण की घोषणा के बाद तीन वर्ष से अधिक समय बीत जाने पर भी धरातल पर निर्माण होना तो अभी कागजों की लड़ाई ही पक्ष और विपक्ष लड़ रहा है। लेकिन इस घोषणा के बाद मुख्य बाजार में संचालित पुराने अस्पताल को उपेक्षित कर देने के कारण क्षेत्रवासियों को स्वास्थ्य संबधी ट्रोमा (सदमा) दिया है। तीन वर्षों में रोगियों की संख्या जिस हिसाब से बढ़ी है उस हिसाब से चिकित्सालय में कमरे नहीं, जगह नहीं और नया निर्माण कोई करवा नहीं रहा। सरकारी बजट से यहां आवश्यकतानुसार निर्माण इसलिए नहीं हो रहा कि जल्द ही घोषित ट्रोमा सेंटर का निर्माण होगा तो यहां भवन काम नहीं आ सकेगा। वहीं दानदाताओं को भी कोई प्रेरणा नहीं दी जा रही व इस कारण चिकित्सालय में अभी जगह की खासी कमी है। आवश्यकता है कि सामाजिक जिम्मेदारी उठाने वाली संस्थाएं, सामाजिक कार्यकर्ता इसके लिए आगे आए एवं सरकार-विपक्ष के ट्रोमा सर्मथन-विरोध के खेल के समापन का इंतजार छोड़ कर श्रीडूंगरगढ़ चिकित्सालय में छत पर एवं कई जगहों पर खाली पड़े स्थलों पर आवश्यकतानुसार निर्माण करवाने के लिए दानदाताओं को प्रेरणा देवें।
ओपीडी, चिकित्सक चैम्बर, दवाईयां, जांचें हर जगह लाइनें, बढ़ाएं जांए कक्ष तो सुधरे तस्वीर।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। श्रीडूंगरगढ़ अस्पताल की स्थिति यह है कि बीमार व्यक्ति श्रीडूंगरगढ़ चिकित्सालय पहुंच जाएं तो लाइनों के चक्कर में और अधिक बीमार हो जाए। लाइनों की शुरूआत अस्पताल में घुसते ही शुरू होती है, क्योंकि 1000 से अधिक ओपीडी की पर्चियां काटने के लिए केवल दो ही काऊंटर है, इनमें भी आए दिन कार्मिक अवकाश पर जाने के कारण एक ही काम करता है। जैसे तैसे पर्ची कटवा ले तो रोगी को एक ही कमरे में एक से अधिक चिकित्सकों के बैठने के कारण भारी भीड़ की लाईनों में लगना पड़ता है। यहां से निकल कर जांचों के लिए, एक्सरे के लिए, दवाईयों के लिए रोगियों को लाईनों में लगना पड़ रहा है। यही कारण है श्रीडूंगरगढ़ उपजिला चिकित्सालय में कोई गंभीर अवस्था का रोगी आने से पहले सौ बार सोचता है। जो सक्षम है वे तो निजी चिकित्सालयों का रूख कर ही लेते है। यहां की अव्यवस्था के कारण लोगों को कर्ज लेकर निजी चिकित्सालयों में उपचार लेना पड़ता है।
अधिकारी उदासीनता छोडें तो सुधर सकती है कई व्यवस्थाएं।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। मेडिकल रिलिफ सोसायटी का अपना स्वंय का बजट है एवं स्थानीय चिकित्साधिकारी अस्पताल में आवश्कतानुसार उसका खर्च भी कर सकते है। लेकिन उदासीनता का आलम यह है कि लाखों रुपए की सोनोग्राफी मशीन, लाखों रुपए का जनरेटर लंबे समय से खराब पड़े है। सोनोग्राफी मशीन सही नहीं करवाने के संबध में तो कई लोगों के आरोप यह भी है, कि निजी लैबों में चल रही सोनोग्राफी मशीनों को लाभ देने के लिए जानबूझ कर खराब रखी जा रही है। इन आरोपों में सच्चाई कितनी है यह तो नहीं कह सकते लेकिन अधिकारियों की उदासीनता प्रत्यक्ष सामने नजर आ रही है। जनरेटर नहीं चलने के कारण कई बार तो यह स्थिति बन जाती है कि मोर्चरी में रखा शव-फ्रीजर नहीं चलने के अभाव में सड़ने लगते है और आस पास के पूरे इलाके में दुर्गंध फैल जाती है। इसी प्रकार अस्पताल की बदहाल सफाई व्यवस्था, कपड़ा धुलाई व्यवस्था, पार्क एवं पार्किंग व्यवस्थाओं को थोडे़ से प्रयासों से सुधारा भी जा सकता है।

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। एक कमरे में 1 से ज्यादा डॉक्टर होने से कमरों में रहती है भीड़।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। अस्पताल में बैठने को जगह नहीं, बुजुर्ग और बच्चे हो रहें परेशान।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। अस्पताल में बैठने को जगह नहीं, रोगी हो रहें परेशान।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। एक कमरे में 1 से ज्यादा डॉक्टर होने से कमरों में रहती है भीड़।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। पर्ची कटवाने से शुरू होता संघर्ष, कर्ची कटवाने के लिए लगती है लंबी कतारें।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। अस्पताल में ओपीडी की पर्ची लेने के लिए अस्पताल के बाहर तक लगी है मरीजों की कतार।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। डॉक्टरों के कमरों के बाहर लगी भीड़।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। उपजिला अस्पताल में नहीं रहती पैर रखने को जगह।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। इस कक्ष में चलता है कथित ट्रोमा।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। जांच के इंतजार में बैठे है मरीज व उनके परिजन।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। दवाइयां लेना भी है मुश्किल।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। 6 घंटे में 200 रोगी तक देख रहे है तैनात डॉक्टर।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। कथित पार्क के मेनेटेन्स पर खर्च हो रहा पैसा, इस जगह शेड बन कर बैठने को लगे कुर्सियां तो मिले राहत।