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October 16, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स गेस्ट राइटर
ललित पालीवाल
प्रचार प्रसार विभाग विहिप, जोधपुर, प्रांत।
भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक रक्षा बंधन का त्योहार हिन्दू धर्म में सभी समाजों में उमंग व उत्साह के साथ मनाया जातो है। परंतु हिन्दू धर्म का एक वर्ग श्री आदि गौड़ वंशीय पालीवाल ब्राह्मण समाज पिछले 734 वर्षो से इस त्योहार को नहीं मना रहा है। ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार राजस्थान के पाली मारवाड में पालीवाल समाज 6वीं सदी से रह रहे थे। पाली नगर में करीब एक लाख से अधिक पालीवालों की आबादी थी। ऐसा भी उल्लेख है कि यहां आने वाले प्रत्येक ब्राह्मण को एक ईंट व एक रूपए का सहयोग कर उसे संपन्न बना दिया जाता था। तत्कालीन दौर में पाली के आसपास लुटेरों का आतंक था जिसका वे शिकार बनते थे। माना जाता है कि एक बार राव सीहाजी (जिन्हें मारवाड़ का संस्थापक व राठौड़ वंश का आदि पुरुष माना जाता है, पहले कन्नौज के शासक थे, वे पुष्कर की तीर्थ यात्रा के समय मारवाड़ आए थे। उस समय मारवाड़ की जनता दस्यू लुटेरों की लूटपाट से पीड़ित थी राव सीहा के आगमन की सूचना पर पाली नगर के पालीवाल ब्राह्मणो ने पाली नगर को लूटपाट व अत्याचारों से मुक्त करने की प्रार्थना की तो सीहा राठौड़ ने पाली नगर के पालीवालों की रक्षा का दायित्व लेकर अपना शासन व राजकाज स्थापति किया। आक्रांता जलालुदीन खिलजी जो शम्सुद्दीन कयूमर्स को मारकर फिरोजशाह द्वितीय के नाम से दिल्ली का शासक बना। तब मारवाड़ में मंडोर व ईडर पर आक्रमण के दौरान पाली की समृद्वि व सम्पन्नता के किस्से सुने। विक्रम संवत 1348 ईस्वी सन 1291-92 के आसपास वह अपनी सेना के साथ पाली को लूटने आया। राठौड़ वंश के शास्क राव सीहा के पुत्र इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। खिलजी सेना ने पाली नगर पर चारों ओर से आक्रमण कर लोगों पर अत्याचार किए। पाली को लूटा व पानी के एकमात्र तालाब में गोवंश को मारकर डाल दिया। तत्कालीन समय में पीने के पानी के सीमित संसाधन थे। पालीवाल ब्राह्मणों ने सेना के आक्रमण को देख खुद को भी युद्व में झोंक दिया। युद्व करते हुए हजारों पालीवाल ब्राह्मण बलिदान हुए। पूरी पाली रक्त रंजित हो गयी, मातायें-बहने बहुताधिक संख्या में विधवा हो गयी। जो जीवित बचे उन्होने श्रावणशुक्ल पूर्णिमा रक्षा बंधन के दिन ही अपने जातीय स्वाभिमान, धर्म रक्षार्थ पाली नगर को छोडऩा उचित समझा।
श्रावणी पूर्णिमा को त्याग दिया था पाली।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। श्रावणी पूर्णिमा के दिन शेष ब्राह्मणों ने संकल्प कर पाली नगर का एकसाथ परित्याग कर दिया और पूरे भारत में फैल गए। उसी दिन से पाली के ये ब्राह्मण पालीवाल ब्राह्मण कहलाए। पालीवाल ब्राह्मण समाज द्वारा पाली नगर में पुराने बाजार स्थित‘धौला चौतरा’ को विकसित किया है। हर वर्ष रक्षा बंधन के दिन धौला चौतरा पर पूर्वजों के बलिदान के लिए पुष्पांजलि दी जाती है और तालाब पर जाकर पूर्वजों का तर्पण किया जाता है। तभी से अब तक लगभग 734 वर्षो से पालीवाल ब्राह्मण समाज रक्षाबंधन नहीं मनाता है।