Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
October 16, 2026
00
AdvertisementAdvertisementAdvertisementAdvertisementAdvertisementAdvertisement

विधान सभा चुनाव से ठीक पहले पंजाब में कैप्टन अमरेंद्र सिंह कांग्रेस से अलग हुए तो अब इसी चुनावी तैयारी के बीच उत्तराखंड में अटपटे सुर से हरीश रावत ने कांग्रेस को उलझन में डाल दिया है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस बेहतर स्थिति में दिख रही थी मगर फिर से संकट में आ गई है।
पहले बात पंजाब की। कैप्टन को पार्टी ने सीएम पद से हटाया तो वे विरोधी हुए। विरोध भी इतना बड़ा कि सीधे नई पार्टी बनाने की घोषणा कर भाजपा से हाथ मिला लिया। कैप्टन की पंजाब में अब तक की लंबी राजनीति भाजपा के विरोध की रही मगर बदले तो ऐसे बदले की उसी विरोधी पार्टी से हाथ मिला लिया।
कांग्रेस को अब चुनावी तैयारी में परेशानी हो रही है। क्योंकि कैप्टन के साथ के विधायकों ने अभी तक कांग्रेस नहीं छोड़ी है। ये ही बात पार्टी को अगले विधान सभा चुनाव के लिए उम्मीदवार तय करने में परेशान कर रही है। कैप्टन के नजदीकी लोगों को पार्टी टिकट देकर रिस्क नहीं ले सकती, संशय की स्थिति हो सकती है कुछ अपनों को भी दूर कर दे। क्योंकि जीत के बाद पाला बदलने का खेल भी इन दिनों नये अंदाज में राजनीति में चल रहा है। ये उहापोह की स्थिति कांग्रेस के लिए विकट बनी हुई है।
उत्तराखंड के दिग्गज नेता हरीश रावत ने दो दिन पहले एक ट्वीट कर कांग्रेस के लिए नई परेशानी पैदा की है। यहां भी विधान सभा चुनाव निकट है और कांग्रेस बेहतर स्थिति में है। सारे समीकरण रावत के ट्वीट के बाद उलझ गये हैं।
अपने ट्वीट के जरिये अपरोक्ष रूप से रावत ने नेतृत्त्व को लेकर संशय की बात कही है। उनका ट्वीट ये ध्वनि देता है कि उनको आलाकमान के नेता अलग थलग करने का काम कर रहे हैं। हरीश रावत कैप्टन जैसे पंजाब में कद्दावर नेता है उसी तरह उत्तराखंड में कद्दावर है। तभी तो कांग्रेस उलझन में आई है।
अगर कांग्रेस नेतृत्त्व ने समय रहते उत्तराखंड के इस संकट का हल नहीं निकाला तो यहां भी स्थितियों का राजनीतिक लाभ नहीं ले सकेगी। पार्टी को पहले की धारणाएं ध्वस्त कर पंजाब और उत्तराखंड पर खास काम करना पड़ेगा, अन्यथा बेहतर स्थिति के बाद भी बेहतर परिणाम पाना मुश्किल है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार