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October 16, 2026
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कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हो गई, बड़े निर्णय की उम्मीद थी। क्योंकि बुरी तरह से पांच राज्यों में हार हुई थी। भविष्य पर सवालिया निशान खड़े हुए थे। कांग्रेस जनों के साथ आम लोगों को भी वर्किंग कमेटी से कुछ बड़ा निकलने की उम्मीद थी। राजनीतिक विश्लेषक भी सोच रहे थे कि इस बार तो कुछ धमाका होगा।
मगर रस्म अदायगी के अलावा कुछ नहीं हो सका। वहीं परंपरा निभाई गई। सोनिया गांधी के पास अभी अध्यक्ष पद है, उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की। लगे हाथ राहुल गांधी और प्रियंका ने भी पद छोड़ने का प्रस्ताव दिया। ये हर हार के बाद होता है, इस बार भी हुआ।
हर बार की तरह इस बार भी सब ने पद न छोड़ने का आग्रह इनसे किया। बात पूरी हुई और चिंतन शिविर आयोजित कर हार की समीक्षा का निर्णय लिया गया। पहले भी यही निर्णय लिया जाता रहा है।
जी 23 के नेताओं ने भी नेतृत्त्व न बदलने पर हां कही। ये तो ध्रुव सत्य है कि इस परिवार के बिना वोट पाना मुश्किल है, ये सभी कांग्रेसी नेता जानते हैं। इसी कारण बयान कुछ भी दे दें, मगर बदलाव पर झिझकते हैं। इस बार भी वही हुआ।
मगर मोदी युग की राजनीति में सब कुछ बदला हुआ है। हाईटेक हो गये हैं राजनीतिक दल। सोशल मीडिया का चलन ज्यादा है। आंकड़े बताते हैं कि चुनाव के लिए बेतहाशा धन अभी भाजपा संगठन के पास है। कांग्रेस के पास बहुत कम है। भाजपा का चुनाव प्रचार आक्रामक है और उसमें धर्म, जाति और राष्ट्रवाद का बोलबाला है। वोटर की संवेदना को छूती है भाजपा, उसी से सफल हो रही है।
कांग्रेस इसका तोड़ लगातार हारने के बाद भी ढूंढ नहीं पाई है। कांग्रेस का कमजोर होना भारतीय लोकतंत्र के लिए भी सही नहीं है। लोकतंत्र कायम तभी रहता है जब विपक्ष भी मजबूत हो। मगर मजबूत विपक्ष अभी नहीं है, ये कटु सत्य है।
तभी तो महंगाई, बेरोजगारी बढ़ने के बाद भी भाजपा से जनता का मोह भंग नहीं हो रहा। कमजोर विपक्ष के कारण ही क्षेत्रीय दलों का बड़ा उदय हुआ है और इस बात ने भी कांग्रेस को कमजोर किया है। कांग्रेस को इस विषय पर थी चिंतन के बाद ठोस निर्णय पर पहुंचना होगा, नहीं तो आने वाले समय में ज्यादा परेशानियों से वो घिरेगी।
इस पर मंथन हो। कड़ें निर्णय की जरूरत हो तो वो भी लिए जाये। कांग्रेस को हिचकिचाहट छोड़नी होगी। अपनी पार्टी के लिए ही नहीं, लोकतंत्र को भी मजबूत करने के लिए ये काम जरूरी है। समय की यही मांग है। कांग्रेस के नेता तो आपस मे ही टकराते रहते हैं। इस टकराहट को छोड़ना होगा, नहीं तो कदम आगे बढ़ ही नहीं सकते। पंजाब का उदाहरण सामने है। सिद्धू के उस बयान को याद किया जाये कि कांग्रेस को कांग्रेस ही हरा सकती है। बड़े मायने थे इस बयान के, मगर ध्यान नहीं दिया गया। चन्नी को नेतृत्त्व देना मास्टर स्ट्रोक कहा गया, पर परिणाम तो अनुकूल नहीं मिले।
भाजपा का बड़ा वोट बैंक अब हो गया, इसे स्वीकारने में भी झिझक नहीं करनी चाहिए। उसी के अनुरूप कांग्रेस को अपनी रणनीति बनानी चाहिए। अभी समय सही है। यदि इस मौके को जाने दिया गया तो फिर तो भाग्य ही फैसला करेगा, राजनीति नहीं।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार