Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
October 16, 2026
WhatsApp Image 2025-03-14 at 13.32.20
AdvertisementAdvertisementAdvertisementAdvertisementAdvertisementAdvertisement

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 14 मार्च 2025। अंग्रेज जब भारत में आए तो आश्चर्य से कहते थे कि “ये देश विभिन्नताओं से भरा अद्भूत देश है।“ वास्तव में ये पंक्ति देश के सामाजिक ताने बाने को देखकर स्पष्ट हो जाती है। यहां सौहार्द और स्नेह से अनेक संप्रदाय व पंथ अलग अलग मतों को मानते हुए मिलजुल कर एकसाथ रहते है। गुरूवार को एक ओर जहां देश भर में होली का त्योहार धूमधाम से मनाया गया है, वहीं विश्नोई समाज इस दिन होलिका दहन नहीं करता। समाज के घरों में इस दिन सूतक माना जाता है जिसे राम राम के दिन मंदिर में जाकर हवन पूजन कर पाहल ग्रहण कर निकाला जाता है। इसके बाद ही परिवारों में भोजन आदि की प्रक्रिया पूरी की जाती है। पाहल के बाद ही विश्नोई समाज के लोग एक दूसरे को रामराम करते है। समाज में यह परंपरा न केवल आध्यात्मिक रूप से विशिष्ट है, बल्कि प्रकृति और धर्म रक्षा का एक जीवंत उदाहरण भी है। होलिका दहन न करने के स्थान पर विश्नोई समाज रामा श्यामा की पावन परंपरा का पालन करता है।

होलिका दहन की अग्नि देखते तक नहीं, निकालते है सूतक।

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। होलिका दहन की रात विश्नोई समाज में कोई भोजन नहीं करता है। अगले दिन सुबह हवन किया जाता है, जिसमें वैदिक मंत्रों के साथ यज्ञ कर पर्यावरण की शुद्धि की जाती है। समाज के लोग हवन के उपरांत पाहल ग्रहण कर भोजन करते है। वहीं होलिका दहन की अग्नि को देखते तक नहीं है, जिसे पर्यावरण और जीवों को हानि पहुंचाने वाला मानते है।

बिश्नोई समाज सत्य, अहिंसा व पर्यावरण रक्षा का संदेश देता है।

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। समाज के अनुनायियों ने बताया कि बिश्नोई समाज केवल एक संप्रदाय नहीं बल्कि सत्य, अहिंसा और पर्यावरण रक्षा का जीवंत संदेश है। बिश्नोई समाज के संस्थापक श्रीगुरू जम्भेश्वर भगवान ने बताया कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि जीवों, प्रकृति और सत्य की रक्षा में है। श्रीगुरू जंभेश्वर भगवान की शबदवाणी में भक्त प्रह्लाद जी का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। शबदवाणी में कहा गया है कि प्रह्लाद भक्त ने सत्य और धर्म की राह नहीं छोड़ी, भले ही उन्हें अग्नि में जलाने का प्रयास किया गया। हिरण्यकश्यप ने उन्हें अनेक कष्ट दिए, लेकिन वे अडिग रहें और अंतत: भगवान विष्णु ने उनकी रक्षा की। बिश्नोई समाज प्रह्लाद पंथी है, यानी सत्य, अहिंसा और भक्ति का मार्ग अपनाने वाला, जिस प्रकार प्रह्लाद ने धर्म और ईश्वर भक्ति नहीं छोड़ी, उसी प्रकार बिश्नोई समाज भी अपने 29 नियमों के पालन में अडिग रहता है।

पाहल का जल पवित्र, लेकर करते है प्रतिज्ञा।

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। पाहल परंपरा का जल बिश्नोई समाज में पवित्र जल माना जाता है। जिसे लेकर प्रतिज्ञा की जाती है। समाज के अनुनायियों ने बताया कि गुरू जंभेश्वर ने पाहल का पानी देकर ही विभिन्न धर्मावलंबियों को बिश्नोई में दिक्षीत किया था।

बीकानेर व जोधपुर में है बिश्नोई बाहुल्य।

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। बिश्नोई समाज पश्चिमी राजस्थान में प्रमुखत: बसा हुआ है। जिसमें बीकानेर व जोधपुर में समाज बाहुल्य है। नोखा में करीब 27 गांव बिश्नोई समाज बाहुल्य है और श्रीडूंगरगढ़ में गांव सांवतसर, कुचौर, बनिया व मोरखाना है वहीं अनेक गांवो में इनकी बसावट है। सभी बिश्नोई परिवार होली नहीं मनाते और पाहल के बाद रामराम की परंपरा निभाते है।

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। सांवतसर मंदिर में हुआ आज सुबह हवन पूजन।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। पाहल लेकर निभाई परंपरा।