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October 16, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 11 सितंबर 2021। 🚩श्री गणेशाय नम:🚩

शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है ।
वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।
नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापो का नाश होता है।
योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है ।
*करण के पठन श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है ।

📜 आज का पंचांग 📜

☀ 11 – Sep – 2021
☀ Sri Dungargarh, India

☀ पंचांग
🔅 तिथि पंचमी 19:39:09
🔅 नक्षत्र स्वाति 11:23:07
🔅 करण :
बव 08:49:08
बालव 19:39:09
🔅 पक्ष शुक्ल
🔅 योग एन्द्र 14:40:30
🔅 वार शनिवार

☀ सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ
🔅 सूर्योदय 06:16:50
🔅 चन्द्रोदय 10:31:00
🔅 चन्द्र राशि तुला – 28:13:21 तक
🔅 चन्द्र वास पश्चिम
🔅 सूर्यास्त 18:44:11
🔅 चन्द्रास्त 21:45:59
🔅 ऋतु शरद

☀ हिन्दू मास एवं वर्ष
🔅 शक सम्वत 1943 प्लव
🔅 कलि सम्वत 5123
🔅 दिन काल 12:27:21
🔅 विक्रम सम्वत 2078
🔅 मास अमांत भाद्रपद
🔅 मास पूर्णिमांत भाद्रपद

☀ शुभ और अशुभ समय
☀ शुभ समय
🔅 अभिजित 12:05:36 – 12:55:25
☀ अशुभ समय
🔅 दुष्टमुहूर्त :
06:16:50 – 07:06:39
07:06:39 – 07:56:28
🔅 कंटक 12:05:36 – 12:55:25
🔅 यमघण्ट 15:24:54 – 16:14:43
🔅 राहु काल 09:23:40 – 10:57:05
🔅 कुलिक 07:06:39 – 07:56:28
🔅 कालवेला या अर्द्धयाम 13:45:15 – 14:35:04
🔅 यमगण्ड 14:03:56 – 15:37:21
🔅 गुलिक काल 06:16:50 – 07:50:15
☀ दिशा शूल
🔅 दिशा शूल पूर्व

☀ चन्द्रबल और ताराबल
☀ ताराबल
🔅 अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद
☀ चन्द्रबल
🔅 मेष, वृषभ, सिंह, तुला, धनु, मकर

📜 चोघडिया 📜

🔅काल 06:16:50 – 07:50:15
🔅शुभ 07:50:15 – 09:23:40
🔅रोग 09:23:40 – 10:57:05
🔅उद्वेग 10:57:05 – 12:30:31
🔅चल 12:30:31 – 14:03:56
🔅लाभ 14:03:56 – 15:37:21
🔅अमृत 15:37:21 – 17:10:46
🔅काल 17:10:46 – 18:44:12
🔅लाभ 18:44:11 – 20:10:50
🔅उद्वेग 20:10:50 – 21:37:28
🔅शुभ 21:37:28 – 23:04:06
🔅अमृत 23:04:06 – 24:30:45
🔅चल 24:30:45 – 25:57:23
🔅रोग 25:57:23 – 27:24:01
🔅काल 27:24:01 – 28:50:39
🔅लाभ 28:50:39 – 30:17:18

❄️ लग्न तालिका❄️

🔅 सिंह स्थिर
शुरू: 04:28 AM समाप्त: 06:45 AM

🔅 कन्या द्विस्वाभाव
शुरू: 06:45 AM समाप्त: 09:01 AM

🔅 तुला चर
शुरू: 09:01 AM समाप्त: 11:21 AM

🔅 वृश्चिक स्थिर
शुरू: 11:21 AM समाप्त: 01:39 PM

🔅 धनु द्विस्वाभाव
शुरू: 01:39 PM समाप्त: 03:44 PM

🔅 मकर चर
शुरू: 03:44 PM समाप्त: 05:27 PM

🔅 कुम्भ स्थिर
शुरू: 05:27 PM समाप्त: 06:55 PM

🔅 मीन द्विस्वाभाव
शुरू: 06:55 PM समाप्त: 08:21 PM

🔅 मेष चर
शुरू: 08:21 PM समाप्त: 09:57 PM

🔅 वृषभ स्थिर
शुरू: 09:57 PM समाप्त: 11:53 PM

🔅 मिथुन द्विस्वाभाव
शुरू: 11:53 PM समाप्त: अगले दिन 02:08 AM

🔅 कर्क चर
शुरू: अगले दिन 02:08 AM समाप्त: अगले दिन 04:28 AM

ऋषि पंचमी व्रत पूजा महत्व

सनातन धर्म में किसी भी पूजा या आराधना के लिए पवित्रता का बहुत अधिक महत्व होता हैं। माहवारी के समय महिलाओं के लिए पूजा-आराधना के लिए कई तरह के नियम क़ायदे, बताए गए थे, और कहा गया कि इन नियमों का पालन न होने से दोष लगता है। इस दोष के निवारण के लिए महिलाएं इस व्रत का पालन करती हैं।

ऋषि पंचमी पूजा विधान
इस दिन भी सुबह स्नानादि करने के बाद पूजा करने का नियम निर्धारित किया गया है।
इस दिन घर की साफ़-सफाई के बाद सात ऋषियों के साथ देवी अरुंधती की स्थापना करनी चाहिए।
हो सके तो इस दिन की पूजा में हलके पीले रंग के वस्त्र पहनें।
पूजा शुरू करने से पहले पूरे घर में गंगाजल छिड़कर अगरबत्ती या धूप बत्ती जलाएं।
सप्त ऋषियों की तस्वीर के सामने जल से भरा हुआ एक कलश रख दें।
सप्‍त ऋषि को धूप-दीपक इत्यादि दिखाकर उन्हें पीले फल-फूल और मिठाई अर्पित करें।
इसके बाद सप्त ऋषियों से अपनी किसी भी गलती की माफ़ी मांग लें और दूसरों की मदद करने का संकल्प लें। इस पूजा में कथा कहना या सुनना अनिवार्य है। इसके बाद आरती करें और सभी लोगों में प्रसाद वितरित करें। पूजा करने के बाद अपने घर के बड़े बुजुर्गों के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लें।
📖 कथा 📖

ऋषि पंचमी व्रत के संदर्भ में भगवान ब्रह्मा ने इस व्रत को कलयुग में सभी पापों से दूर करने वाला विशेष व्रत बताया है। जिसका श्रद्धा अनुसार पालन करने से महिलाओं को अपने हर दोष से मुक्ति मिलती है। इस व्रत के पूजन की कथा के अनुसार, पौराणिक काल में एक राज्य में ब्राह्मण पति पत्नी बेहद प्रेम-भाव के साथ रहते थे। दोनों ही पति-पत्नी धर्म पालन में अग्रणी थे। उनकी दो संताने भी थी एक पुत्र एवं दूसरी पुत्री। बेटी के विवाह योग्य होने पर दोनों ब्राहमण दंपति ने उसका विवाह एक अच्छे कुल में किया। परन्तु विवाह के कुछ समय बाद ही बेटी के पति की किसी कारण वश मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु होने के बाद ब्राह्मण की बेटी अपने वैधव्य व्रत का पालन करने हेतु नदी किनारे एक कुटियाँ में रहने लगी। कुछ समय बाद ही विधवा बेटी के शरीर में कीड़े पड़ने लगे। बेटी के इस दुर्दशा को देख ब्राह्मणी मां रोने लगी और उसने ब्राहमण पति से बेटी की इस दशा का कारण पूछा। जिसके बाद ब्राहमण ने अपनी दिव्य शक्ति से अपनी बेटी के पूर्व जन्म को देखा, जिस दौरान उसे ज्ञात हुआ कि पूर्व जन्म में उसकी बेटी ने अपनी माहवारी के समय नियमों का पालन नहीं किया और वर्तमान जन्म में दोष से मुक्ति पाने के लिए ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसी कारण उसके जीवन में सौभाग्य नहीं हैं और उसकी ये दशा हो रही है। पिता द्वारा बताए जाने के बाद ही ब्राह्मण की पुत्री ने पूरे विधि विधान के साथ ऋषि पंचमी के व्रत का पालन शुरू कर दिया। जिसके पश्चात उसे अगले जन्म में पूर्ण सौभाग्य की प्राप्ति हुई।

इस दिन माहेश्वरी समाज में रक्षाबंधन का त्यौहार भी मनाया जाता है

प. विष्णुदत्त शास्त्री (8290814026)