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October 16, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 25 अक्टूबर 2023। विधानसभा चुनाव- 2023 के मतदान के लिए आज से 28 दिन शेष है। ऐसे में श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स द्वारा प्रतिदिन विशेष कवरेज “सत्ता का संग्राम” टाइम्स के सभी पाठकों के लिए चुनाव की काऊंडाउन के साथ प्रस्तुत की जाएगी। प्रतिदिन शाम को एक अंदरखाने की खबर के साथ क्षेत्र की चुनावी चर्चा पाठकों के समक्ष रखी जाएगी। इसी क्रम में पढ़ें आज की टिप्पणी।

बनते-बिगड़ते समीकरणों में उलझी श्रीडूंगरगढ़ की राजनीति, नेताओं ने अपनाया यह मंत्र “न काहू दोस्ती – न काहू से बैर”

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 27 अक्टूबर 2023। “न काहू से दोस्ती न काहू से बैर” यह कहावत भले ही समदृष्टा सद्भाव के लिए कही गई हो लेकिन इन दिनों श्रीडूंगरगढ़ के राजनेताओं पर भी सटीक बैठ रही है। यहां हर दिन बनते-बिगड़ते समीकरणों में नेताओं की आपसी दूरी कब नजदीकी में एवं नजदीक माने जाने वाले नेता कब दूर हो रहे है पता नहीं चल रहा। ऐसे में सभी नेताओं ने यह मंत्र अपना लिया है। समीकरणों की बात करें तो क्षेत्र में कांग्रेस की टिकट पर सारा दारोमदार आकर टिक गया है। 25 एवं 26 अक्टूबर को जयपुर में हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रदेश सम्मेलन के दौरान पार्टी की वरिष्ठ नेता वृंदा करात द्वारा समझौते को लेकर दिए गए सकारात्मक बयान के बाद उनकी दिल्ली बैठक शुक्रवार को भी हुई है। समझौते को सीरे से नकार रहे लोगों द्वारा समझौते के सुर गाने के बाद यहां भी नेताओं की आपसी ट्यूनिंग बदली-बदली सी नजर आ रही है। यहां कांग्रेस के बड़े नेताजी का चुनाव लड़ने का मन तो अब लगभग जगजाहीर सा हो गया है। ऐसे में इन बड़े नेताजी के पीछे भाजपा के भी वर्तमान टिकट के विरोधी नेता इंतजार कर रहे है कि कांग्रेस की टिकट कांग्रेस के बड़े नेता को नहीं मिले तो, हम मैदान में निर्दलीय ताल ठोक देगें और कांग्रेस की टिकट बडे़ नेताजी को मिल गई तो भाजपा पार्टी हमारी मां के नारे को बुलंद कर भाजपा प्रत्याशी के साथ दिखाई देगें। इसी प्रकार आरएलपी भी कांग्रेस की टिकटों का इंतजार कर रही है एवं यहां बड़े नेताजी के आरएलपी सुप्रीमो के सम्पर्क में होने की चर्चांए भी आम है। वहीं कांग्रेस के सभी दावेदार नेता समझौते या वैकेंट रखने की स्थिति में भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ेगें। माकपा की नाव में पतवार चलाने वाले कई पुराने कांग्रेसी मांझी भी कांग्रेस की टिकट का इंतजार कर रहे है संभव है कि कांग्रेस की टिकट बड़े नेता को मिले तो इन मांझियों द्वारा पिछले चुनाव से कहीं ज्यादा ताकत के साथ इस बार माकपा की नाव पार लगाने के लिए चप्पू चलाए जाएगें। वहीं टिकट नए को मिले तो संभव है कि ये मांझी वापस अपनी पुरानी नाव में आ जाए। ऐसे में सभी नेता बड़े असमंजस में है एवं किसी को पता नहीं कि बदलते समीकरणों में कब किसका साथ देना पड़ जाए। बहरहाल जो भी हो सभी पार्टियों के सभी नेताओं के सीन यही है कि ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।