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October 16, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 7 नवम्बर 2023। विधानसभा चुनाव- 2023 के लिए मतदान 25 नवम्बर को होना है एवं मतदान के लिए आज से 17 दिन शेष रहें है। ऐसे में श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स द्वारा प्रतिदिन विशेष कवरेज “सत्ता का संग्राम” टाइम्स के सभी पाठकों के लिए चुनाव की काऊंडाउन के साथ लगातार प्रस्तुत की जा रही है। प्रतिदिन शाम को एक अंदरखाने की खबर के साथ क्षेत्र की चुनावी चर्चा पाठकों के समक्ष रखी जा रही है। इसी क्रम में पढ़ें आज की विशेष टिप्पणी।

पैदल चलने के अनेकों फायदे, पता ही लेट चला।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। पैदल चलने के अनेकों फायदे है, यह बात भले ही स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा सदैव कही जाती रही है परंतु राजनीति में भी पैदल चलने के अनेक फायदे है जो अगर नेता समय पर समझ ले तो निश्चित ही फायदें में रहे। यह अनुभव हुआ श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र के एक बड़े नेता को जिनसे लगातार एसी गाड़ी में सवार रहने के कारण ही कई लोग नाराज रहें है। मसला यह रहा कि सोमवार को श्रीडूंगरगढ़ में बड़ी राजनीतिक रैली हुई और जब यह रैली घूमचक्कर पहुंची तो बड़े नेताजी की फॉर्च्यूनर भीड़ और जाम में फंस गई। सोमवार को ही नामांकनों का अंतिम दिन होने के कारण सिंबल जमा करवाना भी जरूरी था तो नेताजी घूमचक्कर से पैदल ही उपखण्ड अधिकारी कार्यालय के लिए रवाना हुए और पैदल ही वापस आए। इस दौरान रास्ते में बड़ी रैली को उत्सुकता से देख रहें नेताजी की पार्टी के नाराज कार्यकर्ता भी मिल ही गए। अब नाराज हुए तो क्या हुआ उन्हें इंतजार यही था कि नेताजी एक बार बतला लेवें तो सक्रिय हो जाएं। बतला भी लिया गया एवं कार्यकर्ता खुश होकर साथ हो लिए है। तब जाकर नेताजी के शब्द यही रहे कि पैदल चलना तो फायदेमंद ही रहता है।

आ पड़ी बड़ी जिम्मेदारी, कर्तव्यनिष्ठा का सवाल।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। श्रीडूंगरगढ़ के चुनावी माहौल में किसान हितों का झंडा बुलंद करने वाले किसान नेता के परिवार में बड़ी ट्रेजडी हो गई। उनके अल्प आयु जवांई के अचानक हुए निधन के बाद किसान हितों के खेमें में एक बार मायूसी छा गई। नेताजी स्वयं जहां अपनी बेटी पर टूट पड़े इस गम में अपने आंसू छिपा रहे है वहीं सर्मथकों में चुनाव प्रचार ठप्प होने की आशंका मंडराने लगी। ऐसे में लंबे समय से संघर्ष के साथी रहे कार्यकर्ताओं पर ही प्रचार की बड़ी जिम्मेदारी आ गई एवं सभी नए पुराने सर्मथकों की कर्तव्यनिष्ठा का सवाल भी खड़ा किया जा रहा है। राजनीतिक चर्चाओं में सभी ये आंकलन करने में व्यस्त हो गए है कि यह दु:खद घटना राजनीतिक रूप से नेताजी को प्रचार नहीं कर पाने के हालातों में नुकसान करती है या सर्मथकों में जिम्मेदारी का भाव बढ़ने से चुनाव ओर मजबूत होगा। जो भी हो, चर्चा सभी की यही है कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह लेकिन ऐसी घटना विरोधी के साथ भी ना हो।

टीम-बी की बैटिंग पर संशय, यही बनते है भाग्य-विधाता।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। श्रीडूंगरगढ़ के गत बीस सालों से चुनावों में राष्ट्रीय दलों की बी-टीम ही भाग्य विधाता बनी है। यहां वर्ष 2008 में अनुशासित पार्टी ने समझौते का प्रयोग किया तो श्रीडूंगरगढ़ में पार्टी के साथ रह कर पार्टी का विरोध करने की परंपरा शुरू हुई एवं बी-टीम का निर्माण हुआ। बी-टीम ने यहां राष्ट्रीय स्तर की पार्टी की जमानत जब्त करवाई तो बी-टीम का प्रभाव भी बढ़ गया। अनुशासित पार्टी में बी-टीम के प्रयोग को देख कर वर्ष 2013 के चुनावों में देश की सबसे पुरानी पार्टी में भी बी-टीम बन गई एवं सबसे पुरानी पार्टी के लोगों ने ही अनुशासित पार्टी के प्रत्याशी को वोट दिए। इसके बाद तो दोनों ही प्रमुख पार्टियों में बी-टीम की धुंआधार बैटिंग करने की जैसे पंरपरा ही बन गई। वर्ष 2018 में तो दोनों पार्टियों की बी-टीम ने संघर्ष की आवाज बुलंद करने वाली पार्टी का भी साथ दिया एवं उसे भी बड़े अंतर से जितवाया। ऐसे में इस चुनाव में भी दोनो ही मुख्य पार्टियों में बी-टीम मौजूद तो है जो साथ दिख रही है। लेकिन अंदरखाने चर्चा यही है कि किस पार्टी की बी-टीम किसकी ओर से बैटिंग करेगी यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है। हालांकि चर्चा यह भी चल रही है कि अब बी-टीम उतनी फार्म में भी नहीं रही है तो बी-टीम का प्रभाव जो पिछले 20 सालों से श्रीडूंगरगढ़ की राजनीति में गहराया हुआ है वह इस बार हल्का पड़ जाएगा।