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October 16, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 4 जनवरी 2021।
“हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा अब निकलनी चाहिए, सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”
नए साल की शुरूआत और हमारे क्षेत्र में आंदोलन का आगाज, आज के इस विशेष रिपोर्ट में आप पढ़ेंगे श्रीडूंगरगढ़ में पांच जनवरी को होने वाले हल्लाबोल आंदोलन के नींव की, देखेंगे सभी आंकडों को, तथ्यों को, विचार करेगें पालिका के पक्ष की और नागरिकों के पक्ष की, एक समाज के पक्ष की। सबसे पहले एक बात स्पष्ट कर देवें कि श्रीडूंगरगढ टाइम्स प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के लिए प्रतिबद्ध है। खबरें एक विजन के साथ प्रस्तुत कर सकें ये हमारा उद्देश्य है और हमारा धर्म भी, हमारा कर्तव्य भी जो हमें भली भांति स्मरण है। आइए प्रारंभ करें बिल्कुल निष्पक्ष दृष्टि से, 21 दिसम्बर 2020 की अलसुबह अंधेरे में करीब 6 बजे से पहले पूरा प्रशासन पुलिस लवाजमे के साथ बुलडोजर लेकर नेशनल हाइवे पर पहुंचा और तथाकथित अतिक्रमण पर कार्रवाई की गई। बात कार्रवाई सही या गलत की नहीं करते हुए इस मामले को एक नजर में समझने का प्रयास करते हैं।

भूमि पर कब्जा किसका, मालिक कौन..?
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। बात शुरू होती है 3 जून 1963 को जब खसरा नम्बर 341 में 15 बीघा भूमि पर कृषि कार्य करने हेतु 3 साल के लिए राजस्व विभाग ने श्रीडूंगरगढ़ कस्बे के कन्हैयालाल पुत्र हुलासमल माली को आंवटित की गई। और सरकार द्वारा इसी आंवटन को दस वर्षों तक बढ़ा दिया गया। इस आवंटन के बाद की गिरदावरी एवं तत्कालीन सरकार की अधिसूचना को माली परिवार ने सभी जगह दिखा कर इस भूमि पर अपना कब्जा साबित भी किया। इस कब्जे को 27 मई 2001 को तहसीलदार द्वारा जिला कलेक्टर को भेजी गई रिपोर्ट में भी माना गया एवं 26 फरवरी 2002 को उपखण्ड अधिकारी, बीकानेर द्वारा निर्णय देते हुए कन्हैयालाल माली के पक्ष में नियमन करने का आदेश दिया गया। लेकिन विडम्बना रही कि नियमन कमेटी की बैठक ही नहीं हुई। इसी दौरान 11 अगस्त 2003 में तत्कालीन तहसीलदार ने माली के पक्ष में अंतकाल नहीं चढ़े होने के कारण उन्हें धारा 91 का नोटिस थमाया और अपना हक साबित करने को कहा। इस बार भी कन्हैयालाल माली ने अपना हक साबित किया तथा तहसीलदार ने नियमन कमेटी की मीटिंग तक पत्रावली पेडिंग रखते हुए कन्हैयालाल के पक्ष में निर्णय दिया। इसी दौरान 8 अप्रैल 2005 को एक निर्णय से कस्बे की आबादी के आस पास की सभी राजस्व भूमियों को राजस्व विभाग ने नगरपालिका को हेंडऑवर कर दिया और कन्हैयालाल माली के पक्ष में अंतकाल नहीं चढ़े होने के कारण इस भूमि को भी उसमें ही शामिल कर दिया गया। अब पालिका ने वर्ष 1963 से लेकर 2005 तक के समस्त आदेशों को धता बताते हुए अपने नाम चढ़ने के बाद इस भूमि पर अपना दावा कर लिया। हालांकि पालिका के इस दावे को अतिरिक्त जिला कलेक्टर न्यायालय में 9 सितम्बर 2009 को, तहसीलदार न्यायालय ने 9 जुलाई 2010 को, अपीलीय अधिकारी जिला कलेक्टर द्वारा 23 मार्च 2011 को खारिज करते हुए कन्हैयालाल माली के पक्ष में निर्णय दे रखा है। लेकिन पालिका ने फिर भी जमीन हथियाने के लिए अपील संभागीय आयुक्त न्यायालय में कर रखी है। अब अपने इसी दावे को पालिका ने आधार मानते हुए यह इस भूमि पर तोड़फोड़ की कार्रवाई कर दी एवं अब आम अपील कर अपने पक्ष को मजबूत भी बनाना चाह रही है। लेकिन जनता के मनों में सवाल है, और
सबसे बड़ा सवाल, यहीं पर कार्यवाही क्यों..?
भूमि को आंवटी कन्हैयालाल माली से यह भूमि मिली सारस्वत समाज कुण्डिया को, और समाज ने यहां सामूहिक पैसे से निर्माण भी करवाए और पालिका ने उसे तोड़ा भी, ऐसे में सवाल है कि जब श्रीडूंगरगढ के चारों और की राजस्व भूमि जो पालिका को दी गई उसमें से 90 प्रतिशत से अधिक भूमि पर कब्जे हो चुके है और ये कब्जे सभी समाजों के भवनों या सार्वजनिक भवनों, लोगों के मकानों के रूप में स्थापित है। तो केवल सारस्वत समाज को ही टारगेट कर अतिक्रमण हटाने की इतनी बड़ी कार्रवाई क्यों की गई.? पालिका द्वारा द्वेष्तापूर्वक की जा रही कार्यवाहियों का इतिहास भी रहा है, यहां यह भी उल्लेख करना जरूर है कि पालिका ने कुछ माह पूर्व एक कार्रवाई कर गुर्जर समाज के मंदिर को तोड़ा, अपना कब्जा बताया, अतिक्रमण बताया और फिर सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी और मंदिर का पुर्ननिर्माण भी करवाया।

सामाजिक ताने बाने पर असर।
अब बात करते है हमारे शहर के सामाजिक तानेबाने की, इस भूमि पर सारस्वत समाज ने यज्ञशाला का निर्माण करवाया, हजारों की संख्या में यहां लोगों ने हवन पूजन में भाग लिया, यहां मंदिर व छात्रावास भवन निर्माण के लिए नींव का पूजन किया व निर्माण कार्य प्रारम्भ था, अब पालिका कह रही है यहां कोई निर्माण नहीं था, तो बता देवें मौके को पूरे शहर ने ही नहीं बाहर से भी लोंगो ने आ कर देखा है और अवशेष अभी भी मौके पर पड़े है वहां जाकर प्रशासन तस्दीक तो करें। बड़ा सवाल यह है कि आज कार्रवाई एक समाज के सार्वजनिक स्थान पर की गई है, जिसकी लाठी उसकी भैंस की परिपाटी आखिर क्यों प्रारम्भ की जा रही है? अब अधिकांश नागरिकों का कहना है कि सभी समाजों के अधिकांश भवन राजस्व भूमि पर ही बने है कल राज का प्रभाव किसी और के पास होगा और वो फिर किसी समाज को टारगेट कर एक और निर्माण को तोड़ देगा तब भी क्या चुप रहना या विरोध प्रकट इस कार्रवाई पर नहीं करना चाहिए। आखिर एक ही कार्रवाई क्यों कि गई शहर के चारों तरफ से अतिक्रमण हटाने की हिम्मत दिखा कर प्रशासन अतिक्रमण मुक्त शहर बना लेवें।

कार्रवाई का तरीका, इतना क्रुर, हर व्यक्ति के मन में रोष है।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। एकस्वर में घर बाहर सब जगह कार्रवाई के वीडियो को देखकर नागरिकों ने क्षोभ प्रकट किया। तो बात करते है हम इस कार्रवाई के तरीके की तो एक विधवा जो अपने बच्चों के साथ वहां अपने भाई के सहयोग से बनाए घर में रह रही थी। उस महिला को मरी हुई संवेदनाओं के साथ प्रशासन घसीट कर घर के बाहर बच्चों सहित फेंक देता है और पालिका का कहना है कि हमने कार्रवाई सही की है क्या कोई भी सभ्य समाज इस बात को स्वीकार करेगा कि महिलाओं, बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार हो..? पालिका अलसुबह अंधेरे में कार्य करें और अगले दिन देर शाम अंधेरे में फिर पहुंचे, अगर पालिका सही है तो अंधेरे में कार्य क्यों किया गया? बहरहाल सभी चैनल वालों ने इस खबर को उठाया और महिला के सम्मान की बात सभी मंचो से सुनाई दी।

क्या प्रशासन का यही रवैया होना चाहिए?
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। अब कस्बे के आम नागरिकों के मनों में सवाल ये है कि राजनीति अपने स्थान पर है परन्तु जिम्मेदार अधिकारियों को क्या किसी के साथ अपने को दिखाने के लिए इस तरह की कार्रवाई कर देनी चाहिए। क्या ये नेताओं की कठपुतलियां है, श्रीडूंगरगढ़ पालिका प्रशासन ने लंबे समय से ऐसे कारनामे किए है और लगातार करोंड़ों के भ्रष्टाचार में राजधानी जयपुर तक बदनाम हुई है। क्या पालिका को या प्रशासन को अपने पद की गरिमा के अनुरूप कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी? क्या लोकतंत्र का सम्मान भी ये भूल चुके थे। श्रीडूंगरगढ़ की जनता ने प्रशासन को कोरोना काल में अपने सर माथे पर बिठाया, पालिका कर्मियों का गली गली सम्मान किया गया। जब अच्छा करने पर आप क्रेडिट चाहते हो तो नागरिकों के साथ पशुओं सा बर्ताव करने पर कोई आवाज ना उठाए ये लोकतंत्र में कैसे संभव है, या जिसका राज होगा उसके विरोधियों से जुड़े सार्वजनिक भवन को तोड़ फोड़ कर देने की परिपाटी प्रारम्भ करने पर यहां कि जनता उन्हें शाबासी कैसे देगी.? आवश्यकता तो यह है कि सरकार एवं प्रशासन कार्रवाई करें उन अधिकारियों पर जिन्होंने मिलीभगत से करोड़ो के वारे न्यारे करे और सरकारी भूमियों को बेच कर अपने घर भर लिए, अब जब आम जनता ने अपना खून पसीना एक कर अपने घर बार बसा लिए तो इन्हें अतिक्रमण दिखाई दिया, सवाल यह है कि तब अतिक्रमण हटाने की वकालत करने वाले अधिकारी कहाँ थे.? अब साहब जनता तो सवाल पुछेगी, और जिम्मेदारों को जवाब देना भी होगा।