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October 15, 2026
news123
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 24 सितंबर 2021। पहले तो बात एक नारे की। बचपन से स्कूली किताबों में पढ़ते आ रहे हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। बच्चे बच्चे की जुबान पर ये नारा था। जिसने भी इसे गढ़ा, सही गढ़ा। उसके बाद जब देश में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे तो उन्होंने देश को ऊर्जा से भरने के लिए एक सच्चा नारा दिया, जय जवान जय किसान। देश इन्हीं दो वर्गों पर टिका है, ये शाश्वत सत्य है। ये राजनीतिक नहीं व्यावहारिक नारा था जो जनता के गले उतरा।
भले ही बाद में राजनेताओं ने इसे भी राजनीतिक चाशनी में भिगो अपने काम लेना शुरू कर दिया। किसान को अन्नदाता कहा जाता रहा, मगर सर्वाधिक उपेक्षा इसी वर्ग की हुई। खेती घाटे का सौदा हो गई। किसान परिवार संकट में आ गये। सरकारों ने मदद की बेतहाशा घोषणाएं की मगर धरातल पर खेती करने वाले किसान तक उसका लाभ नहीं पहुंचा, वो तो और गरीब होता गया। ये जांच का विषय है कि किसानों के लाभ के लिए बनी योजनाओं का लाभ आखिर किस मिला ?
देश में लगभग एक साल से किसान आंदोलन कर रहे हैं, मगर कोई हल नहीं निकाला गया है। अन्नदाता कहते हैं, मगर उसी की सुनवाई नहीं। ये दोहरा मापदंड है राजनीति का। तीन कृषि बिलों और उससे उपझे आंदोलन का हल निकालने में इतना लंबा समय निकाल देना, हल भी नहीं निकलना, आम आदमी को चिंतित किये है। आम आदमी पक्ष या विपक्ष की बात नहीं बोलता मगर अन्नदाता की बातों पर सम्मान जनक हल की तो अपेक्षा अब करने ही लगा है।
जब देश की अर्थ व्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर टिकी है तो उस वर्ग को सर्वोच्च प्राथमिकता क्यों नहीं, कहीं राजनीति तो नहीं हो रही। यदि आम आदमी ये सोचता है तो गलत भी नहीं।
इसी बीच कल राजस्थान सरकार ने एक घोषणा पर मुहर लगाकर देश में नई बहस को शुरू किया है। तमिलनाडु सरकार ने भी ये निर्णय किया है। ये निर्णय है, अगले वित्तीय वर्ष से अलग से कृषि बजट बनाने का। बहुत उम्मीद भरा निर्णय है और इसके लिए दोनों राज्यों की सरकारें साधुवाद की पात्र है। आजादी के 75 साल बाद ही सही, राज्य सरकारों ने इस विषय पर सोचा तो सही। जब जागें, तभी सवेरा।
केंद्र आजादी के बाद से सदा अलग से रेल बजट प्रस्तुत करता रहा है। क्यूंकि ये रेल आय का बड़ा साधन है। अधिक लोगों के परिवहन का साधन है। वर्तमान सरकार ने जरूर रेल के अलग बजट की परंपरा को बंद किया है, अब ये आम बजट के साथ शामिल कर दी गई। हालांकि इस विभाग के लिए अलग से मंत्री अब भी है। रेलवे को भी अब निजी हाथों में देने का काम शुरू हो गया है, तभी जानकर कह रहे हैं कि इसी कारण अलग बजट की परंपरा को बंद किया गया है।
केंद्र जब भारत को कृषि प्रधान देश मानती है, जय किसान के नारे को स्वीकारती है, किसान को अन्नदाता कहती है तो अलग से कृषि बजट की बात क्यों आरम्भ नहीं हुई। सरकारें किसी एक दल की नहीं रही, अलग अलग दल शासन में रहे हैं। फिर भी ये विचार क्यों नहीं आया।
राजस्थान और तमिलनाडु की राज्य सरकारों ने ये पहल की है तो अन्य सरकारों और केंद्र सरकार को भी इसका अवलम्बन करना चाहिए। कम से कम हाशिये पर गया किसान, अन्नदाता चर्चा के केंद्र में तो आयेगा। शायद इसी बहाने किसान की समस्याओं, परेशानियों पर सार्थक काम हो जाये। कृषि विशेषज्ञ तो अरसे से अलग कृषि बजट की बात करते रहे हैं, उसे अब मान भी लेना चाहिए। इस मसले पर राष्ट्रीय बहस भी शुरू कराई जा सकती है ताकि सार्थक, सही, सटीक निर्णय हो जाये। अन्नदाता को राहत मिल जाये। भारत की जनता उम्मीद पर ही तो सरकारें बनाती है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार