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October 16, 2026
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हो गई है पीर पर्वत सी, अब पिघलनी चाहिये
इस हिमालय से अब कोई गंगा निकलनी चाहिये
स्व दुष्यंत ने इस शेर के जरिये जिंदगी का तजुर्बा बताते हुए कहा है कि पीड़ भी जब पर्वत की तरह बड़ी और विशाल हो जाये तो उसका मर्ज जरूर होना चाहिये। लगभग एक साल से चल रहे किसान आंदोलन पर ये शेर सटीक बैठता है। क्योंकि इस शेर की भावना किसानों के साथ साथ देश के बुद्धिजीवियों, आम जनता की भी है। 26 नवम्बर को किसान आंदोलन को एक साल पूरा हो जायेगा। आजाद भारत का ये पहला बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन है शायद।
तीन कृषि बिलों को वापस लेने की मांग पर किसानों ने राष्ट्रीय राज्य मार्गों पर पड़ाव डाल ये आंदोलन शुरू किया था। अब भी किसान सड़कों पर है। किसान नेताओं और सत्ताधारी दल के नेताओं के मध्य लंबी जुबानी जंग चली है। प्रसाशन और पुलिस से किसानों की टकराहट भी हुई है। माननीय न्यायालय को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है। आदेश जारी करने पड़े हैं। किसानों को आंदोलन के चलते जान भी गंवानी पड़ी है।
आरंभिक दौर में केंद्र सरकार और किसान नेताओं के मध्य लंबी वार्ताएं भी हुई, मगर सभी बेनतीजा रही। महीनों से तो केंद्र सरकार और आंदोलन कर रहे किसानों के मध्य संवाद ही नहीं हुआ। विपक्ष लगातार किसानों के आंदोलन का समर्थन कर रहा है मगर सरकार मौन साधे हैं।
इसी बीच उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी का मामला भी घटित हो गया। आंदोलन ने बहुत स्तर तय किये हैं। 26 नवम्बर को एक साल पूरा होगा इस आंदोलन को। आंदोलन कर रहे किसानों ने इस दिन से आंदोलन के कई चरणों की घोषणा की है, जिससे आम जनता चिंतित है। चिंता संवादहीनता की है। आम जनता को लगता है कि लोकतंत्र में बातचीत से हर मसले का हल सम्भव है, फिर देश के अन्नदाता के इस आंदोलन का हल क्यों नहीं हो रहा। राजनीतिक दलों के अपने अपने दावे हैं, तर्क है। राजनीति अपनी जगह है, मगर आंदोलन का हल तो जरुरी है।
26 को किसान सभाएं करेंगे। बड़ी संख्या में दिल्ली के आसपास जुटेंगे। पहले की तरह 29 से शुरू हो रहे संसद सत्र के दौरान संसद तक मार्च करेंगे। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान आदि से किसान दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन के लिए पहुंचेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब इस आंदोलन का असर चुनावों पर भी होगा। ये जरूर सत्ताधारी दल भाजपा के लिए चिंता का विषय है। भले ही राजनीतिक चिंता से ही हो, अब आंदोलन का हल निकलना चाहिए। लंबे आंदोलन की संवादहीनता टूटनी चाहिए। अहम और टकराहट लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार