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October 16, 2026
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गुरु पर्व, देव दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रधानमंत्री एक बार फिर राष्ट्र को सम्बोधित करने आये। अचानक से उन्होंने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। न केवल कानून वापस लिए अपितु क्षमा के शब्द भी बोले। उन्होंने ये भी कहा कि हम किसानों को इन कानूनों का लाभ समझा नहीं पाये।
इस सम्बोधन ने एक तरह से सरकार की पूरी टीम पर भी सवाल खड़ा कर दिया। क्योंकि जब कानून लाये गए और किसानों ने आंदोलन शुरू किया तो सभी केंद्रीय मंत्री राज्यों, जिलों तक गये, इन कानूनों को सही साबित करने के लिए। किसान सभाएं भी बड़ी संख्या में की। अब जब कानून वापस लेने की घोषणा हुई है तो उससे ये साबित होता है कि सरकार की पूरी टीम किसान और जनता को कानूनों का लाभ समझाने में नाकाम रही। दूसरी तरफ किसान ये कह रहे थे कि हमें ये लाभ नहीं चाहिए, कानून वापस हो। वे अपनी बात सरकार और जनता को समझाने में सफल रह गये।
सब जानते हैं, आने वाले समय में उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधान सभा चुनाव है और आंदोलन करने वालों का बड़ा धड़ा इन प्रदेशों का है। जिन्होंने मुखर विरोध करने का एलान भी कर दिया। रही सही कसर उप चुनावों के परिणामों ने पूरी कर दी। तभी तो केंद्र सरकार को कृषि कानूनों पर यूटर्न लेना पड़ा।
मगर आंदोलन के दौरान भाजपा नेताओं ने किसानों को जो जो संबोधन दिये, उनको कैसे भुलाया जायेगा। होड़ में भाजपा नेताओं ने आन्दोलनजीवी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। ओछे आरोप छोटे नेताओ ने लगाये। इन शब्दों के तीर से आंदोलन कर रहे किसानों को जो घाव मिले वो अब भी भरे नहीं है। आंदोलन के चलते जिन किसानों ने जान गंवाई, उनको कैसे भूलेंगे। लखीमपुर खीरी कांड को भी किसान नहीं भूलेंगे।
अब भी भाजपा नेताओं के बयान कहां गलती मान रहे हैं। वे तो कह रहे हैं कि हम कुछ किसानों को इन कानूनों के लाभ समझा नहीं पाये। दूसरी तरफ विपक्षी दल भी है, जो इसे सरकार की हार बताने में जुट गये हैं। वे आंदोलन के समय भी किसानों के साथ खड़े थे।
आंदोलन कर रहे किसान भी कहां संतुष्ट है, वे भी तो कह रहे हैं कि जब तक संसद में कानून वापस लेने का प्रोसेस पूरा नहीं होता आंदोलन चलेगा। किसानों के मोर्चे ने कहा है कि हमारी एक मांग एमएसपी गारंटी कानून बनाने की भी है, उसे भी पूरा करे सरकार।
राजनीतिक फायदे के लिए कृषि कानूनों को वापस लेने का निर्णय कितना लाभ देगा, ये तो समय बतायेगा। मगर इस किसान आंदोलन ने ये तो साबित कर दिया कि लोकतंत्र में जनता बड़ी होती है, सरकार नहीं। किसानों का ये कहना भी सही लगता है कि जब कानून वापसी करनी ही थी तो देर क्यों की। किसान को अपमानित क्यों किया। किसान आंदोलन की धमक अभी खत्म होगी, ये लगता नहीं। 5 विधान सभाओं के चुनाव तक इसकी आवाज कायम रहेगी, विपक्ष ने इस पर काम शुरू कर दिया है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार