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October 16, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 25 फरवरी 2020। आमतौर पर दो या तीन साल की उम्र के बच्चे तुतलाकर या हकलाकर बोलते है तो उन्हें सुनना बड़ा प्यारा लगता है। लेकिन 10 साल की उम्र के बाद भी हकलाते हुए बोलना जरा चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि दो साल से पांच साल के बीच बोलने की क्षमता विकसित होती है। वे कई शब्दों को अच्छे से नहीं बोल पाते, लेकिन यह चीज लगातार जारी रहे तो दिक्कत है।

www.myupchar.com से जुड़े डॉ. लक्ष्मीदत्ता शुक्ला का कहना है कि शारीरिक कारक मुख्य रूप से बच्चों में हकलाने की वजह बनता है। इन कारणों में से किसी एक कारण से बच्चे हकलाते हैं, जिसमें शामिल है जीभ और होठों को चलाने में कठिनाई, बोलने के अंगों में बाधा पहुंचना, बोलने के अंगों की मांसपेशियों को नियंत्रित करने में असमर्थता। टेंशन, कमजोरी, डर, थकान या अपसेट होने पर भी हकलाहट की स्थिति बढ़ जाती है।

हकलाने के लक्षणों को समझना जरूरी है। बच्चा किसी शब्द या वाक्य को शुरू करने में दिक्कत महसूस करता है। उसे हिचकिचाहट लगती है या फिर बात को तेज गति से बोलता है। हकलाने की स्थिति में बोलते समय तेजी से आंखें भिंचता है, पैरों को जमीन पर थपथपाता है और जबड़ों को हिलाता है।

हकलाना रोकने के लिए जीवनशैली से जुड़े कुछ उपाय करना जरूरी है। सबसे पहले तो बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाएं, क्योंकि स्कूल में, दोस्तों के बीच या रिश्तेदारों के सामने उन्हें इस बीमारी के कारण शर्मिंदा होना पड़ता है। ऐसी स्थिति में परिवार का साथ बहुत जरूरी है। इसके लिए पीड़ित व्यक्ति के साथ कभी भी सख्ती से पेश न आएं। उनकी बात ध्यान से सुनें। आराम-आराम से बात करें। उनके बोलने पर धैर्य रखें और हकलाने वाले बच्चे के शब्दों को खुद पूरा करने की कोशिश न करें बल्कि उन्हें ही बोलने दें। बेहतर होगा कि स्पीच थेरेपी का इस्तेमाल करें। स्पीच थेरेपिस्ट इसका निदान करेगा और संबंधित व्यायाम, दवाएं देगा। स्पीच थेरेपिस्ट बच्चों से उन्हीं शब्दों या अक्षरों को बार-बार बुलवाते हैं, जिन्हें बोलने में बच्चे को परेशानी होती है। लगातार अभ्यास से ये परेशानी दूर हो सकती है। बच्चे का मजाक न उड़ाएं।

हकलाने की समस्या के इलाज के लिए कोई विशेष आहार नहीं है, लेकिन कुछ चीजें फायदेमंद है जिसमें आंवला, बादाम, काली मिर्च, दालचीनी, हरा धनिया शामिल है। यह भी याद रखें कि बच्चों को थोड़ा आराम दें, क्योंकि यह समस्या थकावट, घबराहट और चिंता के कारण ज्यादा होती है। प्राकृतिक तेल के रूप में ब्राह्मी कई रोगों से बचाता है। इस तेल से सिर में मालिश करने से हकलाहट दूर होती है।

बच्चे के बोलने से बीमारी का अंदाजा लग जाता है। बच्चे का उच्चारण सुनने यानी आर्टिकुलेशन टेस्ट के अलावा सुनने की क्षमता की जांच की जाती है और मुंह व जीभ की बनावट भी जांच सकते हैं। नर्वस सिस्टम की समस्या है तो एमआरआई करके दिमाग की स्थिति की जांच की जाती है। हकलाने वाले बच्चे को 5 साल की उम्र तक थेरेपी करा देना चाहिए। बाद में स्पीच थेरेपी कराने का कम असर होता है।