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October 17, 2026
26jan
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पिछले एक दशक से ये बात आम हो गई है कि हर चुनाव से पहले देश में दलबदल अवश्य होता है। दलों में तोड़फोड़ का ये सिलसिला अनवरत है। भाजपा हर चुनाव को गंभीरता से लेती है और उसे न केवल जीतने अपितु विपक्षी दलों को कमजोर करने के अवसर के रूप में लेती है। एक दशक का तो यही सच है।

महामहिम राष्ट्रपति के चुनाव की तैयारी भी एक साल पहले शुरू कर दी गई थी। एनडीए को पता था कि उसके पास सीधा सीधा बहुमत नहीं है, बस उसी के आधार पर नीति बनाई गई। पहले फेज में बहुमत जुटाना था तथा साथ ही विपक्षी दलों को कमजोर भी करना था। इसी रणनीति के तहत उड़ीसा के बीजू जनता दल को पहले साधने का काम हुआ। उड़ीसा से उम्मीदवार बनाकर नवीन पटनायक के सामने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा गया। अब चुनाव जीतना तय हो गया। फिर महाराष्ट्र में शिव सेना पर नजर गई। इस दल के भीतर आपसी टकराहट थी, उसका फायदा मिला। न केवल भाजपा ने वहां गठबंधन की सरकार बनाई अपितु चुनाव के लिए समर्थन भी जुटा लिया। 

रणनीतिक उथल पुथल यहीं नहीं रुकी। सपा में सब सही नहीं चल रहा था। अखिलेश और चाचा शिवपाल में खटपट तो चल ही रही थी, उसका फायदा उठाने के प्रयास हुए। ओम राजभर को भी साधने की कोशिश हुई। शिवपाल पर तो असर हो गया, राजभर पर हुआ या नहीं ये आने वाला समय बतायेगा। 

इन राजनीतिक परिस्थितियों के मध्य गोवा के कांग्रेस विधायकों में दरार की बात उजागर हुई। कांग्रेस ने हाथ पांव मारे तो कुछ असंतोष। थमा मगर 11 में से 2 विधायकों पर तो असर हो गया, ये साफ दिख रहा है।

राजस्थान में कांग्रेस की कमान अशोक गहलोत मजबूती से थामे हुए हैं, हर बार असंतोष को थामा। टूट नहीं होने दी। मगर कल उनके सामने भी संकट खड़ा हो गया। विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा आये हुए थे, विधायकों को बुलाया। मगर बीटीपी के विधायक और कुछ कांग्रेस के विधायक नदारद थे। गहलोत फिर से सबको साधने में लग गये। उनके रहते कांग्रेस और सहयोगी विधायकों को तोड़ना इतना आसान तो नहीं रहेगा, ये पहले का अनुभव बताता है। मगर राजनीतिक दलों में चल रही उठापठक राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने के लिए मजबूर कर रही है। सिन्हा को जयपुर में प्रेस से बात करते हुए कहना पड़ा कि चुनाव से पहले ही दलबदल क्यों होता है, इस पर सोचना चाहिए। अभी कुछ और राजनीतिक उथलपुथल की संभावनाएं बनी हुई है, समय उनको सामने लायेगा।

– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘

वरिष्ठ पत्रकार