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October 17, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 27 सितंबर 2021। भारत की सनातन परंपरा में नारी को सर्वोच्च सम्मान मिला है। कहा भी जाता है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहीं देवता निवास करते हैं। मगर लोकतंत्र आने के बाद सत्ताएं और राजनीतिक दल नारी को प्रतिनिधित्व देने की केवल बात करते रहे। कई बिल बनाये, मगर कभी पास नहीं हुए। न राजनीतिक दल महिलाओं को अपने ही वादों की तरह चुनाव लड़ाते हैं। चुनाव का आधार जेंडर समानता नहीं, जीत है, इसी वजह से नारी को उसका वाजिब हक़ 75 साल बाद भी नहीं मिला। आधा प्रतिनिधित्त्व तो छोड़िये, 33 फीसदी भी नहीं मिला।
यूरोप के छोटे से देश आइसलैंड ने अपनी संसद में महिलाओं को आधे से अधिक पहुंचाकर दुनिया को आईना दिखाया। उन सभी देशों को एक चेतावनी दी है। केवल नारी सम्मान, पुरुषों से बराबरी की बात करना छोड़, उनको संसद में भी प्रतिनिधित्त्व देना चाहिए। भारत सहित हर देश में आधी आबादी या आधे वोटर महिलाएं हैं, फिर भी 33 फीसदी भी प्रतिनिधित्त्व नहीं।
आइसलैंड की संसद में पहली बार ये अजूबा हुआ है। एक दैनिक अखबार के भीतर के पेज पर छपी इस छोटी सी खबर ने बड़े बदलाव का बिगुल बजाया है। जिसकी ध्वनि दुनिया के हर देश की महिलाओं को सुनना चाहिए।लैंगिक समानता के लिए मशहूर इस देश में संसद की 63 सीटें हैं, उनमें से इस बार 33 सीट महिलाओं ने जीती है। जो वहां की संसद की कुल सीट का 53. 04 प्रतिशत है। कमाल का काम किया है वहां की जनता ने। दुनिया के सभी देशों की महिलाओं को इस निर्णय की छांव में गंभीरता से सोचना चाहिए। अब नहीं जागी तो फिर कभी नहीं जाग सकेंगी।
इस मामले में कुछ और देशों से भी दुनिया की महिलाएं सीख ले सकती है। यूरोप में ही स्वीडन की संसद में 47 फीसदी और फिनलैंड में 46 फीसदी महिलाएं है। मगर रविवार को घोषित नतीजों से आइसलैंड ने दुनिया को अचंभित कर दिया है। इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन के अनुसार यूरोप से अलग केवल तीन देशों, रवांडा, क्यूबा व निकारागुआ की संसद में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक है।
एशिया में तो महिलाओं के इस तरह के प्रतिनिधित्त्व की कल्पना ही सम्भव नहीं। भारत जो नारी सम्मान की सम्पन्न परंपरा रखता है, वहां भी इस विषय को लेकर राजनीतिक दल गम्भीर दिखाई नहीं देते। बात कई बार हुई, मगर कभी फलीभूत नहीं हुई।
सरकारों ने संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का बिल बनाया। संसद में पेश किया मगर उसे कभी पास नहीं होने दिया गया। कभी किसी सांसद ने बिल फाड़ दिया तो कभी सत्र का अंतिम समय देख हो हल्ले से बिल टाल दिया। सत्य यही है कि प्रतिनिधित्त्व तय नहीं हुआ। जो दल इस विचार के समर्थक हैं वे उम्मीदवार महिलाओं को बनाकर अपनी बात पूरी कर सकते हैं, मगर नहीं करते। केंद्र और राज्यों की अपनी सरकारों में भी दल महिलाओं को 33 फीसदी मंत्री नहीं बनाते। इस सोच को बदलना चाहिए।
हर दल में महिलाएं हैं और महत्ती भूमिका में है, उनको अपने अपने दलों पर कड़ाई से दबाव बनाना चाहिए। संघर्ष कर उनको मजबूर करना चाहिए। बराबरी का हक़ पाना दलीय सीमाएं तोड़ पाना चाहिए। नारी की कोमलता, वात्सल्य, निष्ठा, धैर्य आदि की भारत के पास अनगिनत कहानियां है, जो सत्य है। उनसे पुरुषों और महिलाओं को देश हित में सीख लेनी चाहिए। राजनीति व सत्ता की सूरत और सीरत बदलने के लिए ये प्रयोग करना चाहिए। तभी तो हम अपने समानता के अधिकार की पूरी रक्षा कर सकेंगे। आइसलैंड की जनता ने एक ज्योति प्रज्वलित की है, उसे मशाल बनाने की जरूरत है।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार