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October 16, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 17 सितंबर 2021। 🚩श्री गणेशाय नम:🚩

शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है ।
वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।
नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापो का नाश होता है।
योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है ।
*करण के पठन श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है ।

📜 आज का पंचांग 📜

☀ 17 – Sep – 2021
☀ Sri Dungargarh, India

☀ पंचांग
🔅 तिथि एकादशी 08:09:45
🔅 नक्षत्र श्रवण 27:36:19
🔅 करण :
विष्टि 08:09:45
बव 19:30:58
🔅 पक्ष शुक्ल
🔅 योग अतिगंड 20:19:55
🔅 वार शुक्रवार

☀ सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ
🔅 सूर्योदय 06:19:39
🔅 चन्द्रोदय 16:37:59
🔅 चन्द्र राशि मकर
🔅 चन्द्र वास दक्षिण
🔅 सूर्यास्त 18:37:06
🔅 चन्द्रास्त 27:23:59
🔅 ऋतु शरद

☀ हिन्दू मास एवं वर्ष
🔅 शक सम्वत 1943 प्लव
🔅 कलि सम्वत 5123
🔅 दिन काल 12:17:27
🔅 विक्रम सम्वत 2078
🔅 मास अमांत भाद्रपद
🔅 मास पूर्णिमांत भाद्रपद

☀ शुभ और अशुभ समय
☀ शुभ समय
🔅 अभिजित 12:03:48 – 12:52:58
☀ अशुभ समय
🔅 दुष्टमुहूर्त :
08:47:09 – 09:36:19
12:52:58 – 13:42:08
🔅 कंटक 13:42:08 – 14:31:18
🔅 यमघण्ट 16:58:47 – 17:47:57
🔅 राहु काल 10:56:12 – 12:28:23
🔅 कुलिक 08:47:09 – 09:36:19
🔅 कालवेला या अर्द्धयाम 15:20:27 – 16:09:37
🔅 यमगण्ड 15:32:45 – 17:04:56
🔅 गुलिक काल 07:51:50 – 09:24:01
☀ दिशा शूल
🔅 दिशा शूल पश्चिम

☀ चन्द्रबल और ताराबल
☀ ताराबल
🔅 अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुष्य, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तराभाद्रपद
☀ चन्द्रबल
🔅 मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, मकर, मीन

📜 चोघडिया 📜

🔅चल 06:19:39 – 07:51:50
🔅लाभ 07:51:50 – 09:24:01
🔅अमृत 09:24:01 – 10:56:12
🔅काल 10:56:12 – 12:28:23
🔅शुभ 12:28:23 – 14:00:34
🔅रोग 14:00:34 – 15:32:45
🔅उद्वेग 15:32:45 – 17:04:56
🔅चल 17:04:56 – 18:37:06
🔅रोग 18:37:06 – 20:04:59
🔅काल 20:04:59 – 21:32:52
🔅लाभ 21:32:52 – 23:00:44
🔅उद्वेग 23:00:44 – 24:28:37
🔅शुभ 24:28:37 – 25:56:30
🔅अमृत 25:56:30 – 27:24:22
🔅चल 27:24:22 – 28:52:15
🔅रोग 28:52:15 – 30:20:07

❄️ लग्न तालिका❄️

🔅 सिंह स्थिर
शुरू: 04:04 AM समाप्त: 06:21 AM

🔅 कन्या द्विस्वाभाव
शुरू: 06:21 AM समाप्त: 08:37 AM

🔅 तुला चर
शुरू: 08:37 AM समाप्त: 10:57 AM

🔅 वृश्चिक स्थिर
शुरू: 10:57 AM समाप्त: 01:16 PM

🔅 धनु द्विस्वाभाव
शुरू: 01:16 PM समाप्त: 03:20 PM

🔅 मकर चर
शुरू: 03:20 PM समाप्त: 05:03 PM

🔅 कुम्भ स्थिर
शुरू: 05:03 PM समाप्त: 06:31 PM

🔅 मीन द्विस्वाभाव
शुरू: 06:31 PM समाप्त: 07:57 PM

🔅 मेष चर
शुरू: 07:57 PM समाप्त: 09:33 PM

🔅 वृषभ स्थिर
शुरू: 09:33 PM समाप्त: 11:29 PM

🔅 मिथुन द्विस्वाभाव
शुरू: 11:29 PM समाप्त: अगले दिन 01:44 AM

🔅 कर्क चर
शुरू: अगले दिन 01:44 AM समाप्त: अगले दिन 04:04 AM
📖 पद्मा एकादशी 📖

इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि इस दिन वामन देव की पूजा करने से वाजपेय यज्ञ के जितना फल मिलता है और मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। परिवर्तिनी एकादशी को पार्श्व एकादशी, वामन एकादशी, जयझूलनी एकादशी, पद्मा एकादशी, डोल ग्‍यारस और जयंती एकादशी जैसे कई नामों से जाना जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु के वामन अवतार के साथ-साथ लक्ष्मी पूजन करना भी श्रेष्ठ माना गया है।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत की कथा
परिवर्तनी एकादशी के दिन व्रत रखने वालों को भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा को अवश्य पढ़ना या सुनना चाहिए। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले महाभारत काल के समय पांडव पुत्र अर्जुन के आग्रह करने पर भगवान कृष्ण ने परिवर्तिनी एकादशी के महत्व के विषय में बताया था। कथा अनुसार त्रेतायुग में बलि नाम का एक असुर था,जो कि भगवान् विष्णु का परम भक्त था। बलि बहुत ही दानी,सत्यवादी और ब्राह्मणों की सेवा करता था। वह हमेशा यज्ञ, तप आदि भी किया करता था।

अपनी भक्ति के प्रभाव से राजा बलि बेहद शक्तिशाली हो गया था। उसे देवराज इंद्र से द्वेष था, जिसके चलते उसने इंद्रलोक पर विजय पायी और स्वर्ग में देवराज इंद्र के स्थान और सभी देवताओं पर राज्य करने लगा। बलि से भयभीत और परेशान होकर देवराज इंद्र और सभी देवतागण मदद के लिए भगवान विष्णु के पास गए और भगवान से रक्षा की प्रार्थना की। देवताओं की परेशानी को दूर करने के लिए विष्णु जी ने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और एक ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के पास गए और अपने तेजस्वी रूप से उसपर विजय प्राप्त की।

वामन रूप धारण किये हुए भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली। बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था। लेकिन उसके अंदर एक गुण था कि वह कभी किसी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं लौटने देता था। वह ब्राह्मण को दान में मांगी वस्तु अवश्य देता था। वामन देव ने बलि से तीन पग भूमि की मांग की। वहां मौजूद दैत्य गुरु शुक्राचार्य भगवान विष्णु की चाल को समझ गए और बलि को आगाह भी किया। लेकिन बावजूद उसके बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उन्हें तीन पग जमीन देने का वचन दे दिया।

वचन मिलते ही विष्णु जी ने विराट रूप धारण कर लिया और एक पांव से पृथ्वी तो दूसरे पांव की एड़ी से स्वर्ग और पंजे से ब्रह्मलोक को नाप लिया। अब तीसरे पांव के लिए राजा बलि के पास कुछ भी नहीं बचा था। इसलिए बलि ने वचन पूरा करते हुए अपना सिर उनके पैरों के नीचे कर दिया और भगवान वामन ने तीसरा पैर राजा बलि के सिर पर रख दिया। राजा बलि की वचन प्रतिबद्धता से खुश होकर भगवान वामन ने उसे पाताल लोक का स्वामी बना दिया और कहा कि, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।

परिवर्तिनी एकादशी के दिन श्री विष्णु की एक प्रतिमा राजा बलि के पास रहती है और दूसरी क्षीर सागर में शेषनाग पर शयन करती रहती है। इस एकादशी के दिन ही विष्णु भगवान सोते हुए करवट बदलते हैं।

पण्डित विष्णुदत्त शास्त्री
8290814026