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October 16, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 14 जनवरी 2026। श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स में मकर संक्रांति पर जरूर पढें विशेष कॉलम “अभिव्यक्ति” में शिक्षाविद ओमप्रकाश राजपुरोहित (राज सर) की कलम से विशेष आलेख:-

भारत में मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक विचार है—नई दिशा, नई ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक। यह वह दिन है जब सूर्य उत्तरायण होता है और अं धकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है। इसी दिन आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है और हर पतंग मानो हमें जीवन का कोई न कोई गूढ़ रहस्य सिखा रही होती है।
पहली और सबसे बड़ी सीख—हल्का होना।
पतंग तभी ऊँचाई तक उड़ पाती है जब वह हल्की होती है। यदि उस पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया जाए, तो वह उड़ान नहीं भर सकती। ठीक इसी प्रकार मनुष्य भी जीवन में तभी आगे बढ़ पाता है जब उसका मन और मस्तिष्क हल्का हो। अहंकार, ईगो, द्वेष, ईर्ष्या, नकारात्मक सोच—ये सभी हमारे भीतर का बोझ हैं। जब हम इनसे चिपके रहते हैं, तब हमारी प्रगति रुक जाती है।
मकर संक्रांति हमें यह संदेश देती है कि हमें अपने भीतर जमी हुई कठोरता को पिघलाना चाहिए, पुराने गिले-शिकवे छोड़ देने चाहिए और मन को निर्मल बनाना चाहिए। जैसे पतंग हवा के साथ बहना सीखती है, वैसे ही हमें भी परिस्थितियों को स्वीकार कर आगे बढ़ना सीखना चाहिए। हल्का मन ही ऊँची उड़ान भर सकता है।
दूसरी महत्वपूर्ण सीख—डोर से जुड़ाव।
पतंग चाहे जितनी भी ऊँचाई पर क्यों न उड़ रही हो, वह डोर से बंधी होती है। वही डोर उसकी दिशा, संतुलन और सुरक्षा होती है। यदि डोर कट जाए, तो पतंग भले ही कुछ क्षण हवा में तैर ले, लेकिन अंततः गिर ही जाती है।
इसी तरह हमारा जीवन भी हमारी जड़ों, संस्कारों, मूल्यों और परंपराओं से जुड़ा होना चाहिए। आधुनिकता और सफलता की ऊँचाइयों को छूते हुए भी यदि हम अपने संस्कारों से कट जाए, तो हमारा संतुलन बिगड़ सकता है। परिवार, संस्कृति और नैतिक मूल्य—ये हमारी जीवन-डोर हैं, जो हमें सही दिशा देती हैं।
मकर संक्रांति का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि ऊँचा उड़ना है तो मन हल्का रखो और जड़ों से जुड़े रहो ।
इसी संदेश के साथ आप सभी को मकर संक्रांति एवं पतंग उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।
आपका जीवन भी पतंग की तरह ऊँचाइयों को छुए, संतुलित रहे और आनंद से भरा हो।